ज्ञानसागर ब्लॉग में आपका हार्दिक अभिनंदन है !! किसी भी सुझाव,विचार,विमर्श के लिए संपर्क करे 8802939520

Header Ads



एक शिक्षाप्रद कहानी - सीख किसी से भी मिले ग्रहण कर लेनी चाहिये | Motivational Story In Hindi | Gyansagar ( ज्ञानसागर )


सीख किसी से भी मिले ग्रहण कर लेनी चाहिये उन दिनों छत्रपति शिवाजी मुगलों के विरुद्ध छापामार युद्ध लड़ रहे थे। एक रात वह थके-मांदे एक बुढ़िया की
झोंपड़ी में जा पहुंचे। वहां पहुंचते ही उन्होंने बुढ़िया से कुछ खाने के लिए मांगा। बुढ़िया के घर में उस समय
थोड़ा चावल बचा हुआ था। उसने फौरन शिवाजी के लिए प्रेमपूर्वक भात पकाया और परोस दिया।
शिवाजी को बहुत तेज भूख लगी हुई थी। झट से भात खाने की आतुरता में उनकी उंगलियां जल गईं। हाथ की जलन
शांत करने के लिए वह फूंक मारने लगे। उन्हें ऐसा करता देख बुढ़िया ने उनके चहरे की ओर गौर से देखा और बोली, 'सिपाही, तेरी सूरत शिवाजी जैसी लगती है, साथ ही लगता है कि तू उसी की तरह मूर्ख भी है।' बुढ़िया की यह बात सुनकर शिवाजी स्तब्ध रह गए। उन्होंने बुढ़िया से पूछा-'आप जरा शिवाजी की मूर्खता के साथ ही मेरी भी कोई मूर्खता तो बताएं।' बुढ़िया ने उत्तर दिया, 'तूने किनारे-किनारे से थोड़ा-थोड़ा ठंडा भात खाने की बजाय बीच के गरम भात में हाथ डाला और अपनी उंगलियां जला लीं। ठीक यही मूर्खता शिवाजी करता है। वह दूर किनारों पर बसे छोटे-मोटे किलों को आसानी से जीतते हुए शक्ति बढ़ाने की बजाय बड़े किलों पर धावा बोल देता है और फिर हार जाता है। शिवाजी को अपनी रणनीति
की विफलता का कारण समझ में आ गया। उन्होंने बुढ़िया की सीख मान ली और पहले छोटे-छोटे लक्ष्य बनाए। उन्हें पूरा करने की रणनीति अपनाई। वह सफल रहे और उनकी शक्ति बढ़ती गई। अंततः वह बड़ी विजय पाने में भी समर्थ हुए। उस
बुढ़िया की बात सही साबित हुई। अतः 
सीख किसी से भी मिले ग्रहण कर लेनी चाहिए क्योंकि वो सीख शिवाजी की तरह ही अति उपयोगी साबित हो सकती है !!


सारांश सागर

सारांश सागर द्वारा प्रकाशित किया गया

अनुभव को सारांश में बताकर स्वयं प्रेरित होकर सबको प्रेरित करना चाहता हूँ !             



No comments

Powered by Blogger.