पूजा अथवा भक्ति किसकी करें ?


सनातन धर्म में अनेकों देवी-देवता हैं । इसलिए प्रश्न उठता है कि किसकी पूजा अथवा भक्ति की जाए । इस सम्बन्ध में हम एक उदाहरण प्रस्तुत करेंगे । ये हैं श्रीराम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी । गोस्वामी तुलसीदास जी ने सनातन धर्म के मर्म को भलीभांति समझकर लोगों के समक्ष अपनी रचनाओं के माध्यम से रखा । इन्होंने जो धर्म-आदर्श हमारे सामने रखा वह अवश्य ही अनुकरणीय है । वही सनातन धर्म का मूल है । प्राण है ।
सनातन धर्म के जो प्रमुख देवता हैं । उनमें से किसी एक कोके बारे में आप जानते हों । जो आपके मन में बसते हों । जो आपको अच्छे लगते हों । उन्हें ही अपना इष्ट बनाकर पूजना चाहिए । उनकी ही भक्ति करनी चाहिए । उन्हीं से अपने मन की बात कहनी चाहिए । उन्हीं से यदि कुछ माँगना हों तो माँगना चाहिए ।
सनातन धर्म के अनुसार या यूँ कहें कि गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार एक सच्चा भक्त एक धर्म परायण पतिव्रता स्त्री की तरह होना चाहिए । जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति सम्पूर्ण समपर्ण का भाव रखती है । और साथ ही अपने सास-ससुर, देवर आदि अन्य सगे सम्बन्धियों का भी उचित सम्मान करती है । किसी का निरादर अथवा अपमान नहीं करती । लेकिन पूर्ण समर्पण सिर्फ पति के प्रति ही रखती है । ठीक इसी तरह किसी एक देवता के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखते हुए अन्य देवी-देवताओं का भी उचित आदर करना चाहिए ।
जैसे यदि कोई भगवान श्रीराम का भक्त है । तो उसे भगवान शिव का भी पूजन करना चाहिए । ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमें शिव जी से कोई मतलब नहीं है । क्योंकि हमारे तो आराध्य श्रीरामजी हैं । बिना शिव भक्ती के श्रीराम भक्ती नहीं मिलती । कहने का मतलब ऐसा नहीं होना चाहिए कि कहीं शिवालय हो तो वहाँ कभी न जाएँ । महाशिवरात्रि को भी शंकर जी को एक लोटा जल न चढाएं । ऐसा भाव बिल्कुल गलत है ।
गोस्वामी तुलसीदास जी पूर्ण समर्पण केवल भगवान श्रीराम के प्रति ही रखते थे । लेकिन शिवजी, गणेश, हनुमानजी, दुर्गाजी, सूर्यदेव आदि सभी का पूजन करते थे । पूजा तो सबकी करते थे । लेकिन सभी से भगवान श्रीराम के चरणों में निर्मल भक्ति का ही वरदान माँगते थे । जैसे गणेश जी की वन्दना करते हुए लिखा है-“माँगत तुलसीदास कर जोरे । बसहिं राम सिय मानस मोरे ।।“ इसी तरह भगवान शंकरजी से माँगते हैं कि-“तुलसिदास जाचक गुण गावै । विमल भगति रघुपति की पावै ।“
कई संतो का भी मत है कि व्यभिचारिणी भक्ति ठीक नहीं होती । व्यभिचारिणी स्त्री को भी कोई ठीक नहीं कहता । कहने का मतलब पूर्ण समर्पण एक के प्रति रखो । कुछ माँगना हो तो उसी से मांगो । इधर-उधर मत भटको ।
लेकिन किसी एक देवता को पूजना व अन्य का निरादर करना ठीक नहीं है । सबका आदर करें । लेकिन इष्ट किसी एक को ही मानकर उसकी ही पूजा व भक्ति करें । यही संदेश गोस्वामी तुलसीदासजी के जीवन से हमें मिलता है । यही सही भी है.....

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