एक विशेष प्रसंग- नारी से ही जीवन है



सृष्टि-सृजन का आदिक्रम चला, देव और दानवो से अधिक बल और शक्ति मनुष्य को प्राप्त हुयी। मानव हर क्षेत्र में इनसे बढ़कर था। विद्या,बुद्धि,धन,वैभव में मनुष्य ही अग्रणी था। जब भी वह इच्छा करता दानवो और देवो को परास्त कर डालता। मानव की शक्ति सद उन दिनों सभी भयभीत रहते थे।

एक दिन अच्छे देव-दानवो में सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा जी से शिकायत की-"आपने मनुष्य को इतना सशक्त बनाया है कि वह सबको भयभीत रखता है। उसकी शक्ति के आगे किसी की नही चलती। समस्त धरती का वैभव उसके हाथ में है, हम लोग केवल उसके आश्रित रह गए है। हमे वह अधिकार दीजिये, जिससे हम भी स्व्वश जी सकें,मनुष्य से डरने की बात का अंत आप ही कर सकते है।"
ब्रह्माजी ने विचार किया और उत्तर दिया-"जब तक मनुष्य को मानवी 'नारी'की शक्ति मिलती रहेगी,वह अजेय है,अजेय रहेगा, हम उसके लिए कुछ नही कर सकते।" देव-दानव चले गए। कालांतर में मनुष्य अहंकार से भरकर नारी शक्ति की उपेक्षा करने लगा, तब से मनुष्य निः शक्त हो गया और देव तथा दानव प्रबल होते गए।
सामाजिक संगठन,समुन्नति की प्रेरक भी नारी है। राष्ट्र का निर्माण,सौभाग्य और लक्ष्मी भी वही है। जिस देश और जाति में नारी का पूज्य स्थान होता है, वह देश और जातियां गौरव प्राप्त करती है, सिर ऊँचा उठाकर स्वाभिमान के साथ अमर रहती है।
सुप्रसिद्ध विचारक अरस्तू का कथन है-" नारी की उन्नति या अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति या अवनति निर्धारित है।"
भाव और चरित्र की दृष्टि से नारी वर्ग पुरुष वर्ग से बहुत ऊँचा है।
राम से पहले सीता और कृष्ण से पहले राधा नाम का उल्लेख स्त्री चरित्र की प्रबलता का परिचायक है।" जो काम पुरुष शक्ति तांडव द्वारा करता है नारी उसे सहज,स्नेह,सरल और सौम्यतापूर्वक सम्पन्न कर लेती है। युग परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरा करने में लिए उसी को जगाना चाहिए,उसी को बढ़ाना चाहिए और विश्व शांति के उपयुक्त वातावरण बनाने की उसी से याचना करनी चाहिए। नारी तत्व को प्रतिष्ठित-पूजित किये बिना हमारा उद्धार हो सकता। आज अपने देश में अनगिनत समस्या पग पग पर छाई हुयी है, उन्हें सुलझाने में देश की नारियां महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। वस्तुतः किसी भी उत्थान के लिए वहां की महिलाओं की त्याग और तपश्चर्या ही होती है।
नारी देवत्व की मूर्तिमान प्रतिमा है। नारी की अपनी विशेषता है -उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति।
बेटी,बहन,धर्मपत्नी और माता के रूप में वे परिवार के लिए जिस प्रकार उद्दात्त आदर्शो से भर-पूरा जीवन व्यतीत करती है,उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पुरुषार्थ प्रधान नर अपनी जगह ठीक है, पर आत्मिक सम्पदा की दृष्टि से वह नारी से पीछे ही रहेगा।
नवयुग का नेतृत्व नारियां ही करेगी,परन्तु उससे पूर्व अपनी पात्रता सिद्ध करनी है, अपनी शक्ति-सामर्थ्यों का परिचय देना है। मजबूत कन्धे ही भार वहन करने में सक्षम हो सकते है।
एक विशेष प्रसंग- नारी से ही जीवन है
नारी की अपनी एक गरिमा है। वह पुरुष की जननी है। हम परमेश्वर के पश्चात सर्वाधिक ऋणी अगर है तो नारी के, क्योंकि प्रथम परमात्मा मानव जीवन देता है, किन्तु द्वितीय मातृशक्ति नारी हमें जीने योग्य बनाती हैं। नारी स्नेह और सौजन्य की देवी है। वह पुरुष की निर्मात्री है। किसी राष्ट्र का उत्थान नारी जाति के उत्थान से ही होता है। वर्तमान समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन में नारी के सहयोग की अति आवश्यकता अनुभव की जा रही है।

राष्ट्र की भावी पीढ़ी का निर्माण करने वाली माँ ही है। समाज के निर्माण में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए उसे मनुष्य रूप में विकास करने का समान अधिकार दिया जाये, तभी वह भावी पीढ़ी का निर्माण दक्षतापूर्वक कर सकेगी और समाज का भविष्य उज्ज्वल हो सकेगा। समाज का आधा अंग महिलाओ से बनता है, वह केवल पुरुष की अर्द्धांगिनी ही नही है, वरन् समाज का आधा अंग है। समाज के उत्थान-पतन में उसकी समान भूमिका है। समाज उन्नत बनाना है, तो नारी को भी पुरुष के समान शिक्षित,ज्ञानी,साहसी,आत्मबल से सम्पन्न महिला परिवार,समाज में अपने उत्तरदायित्वों को भलीभांति निबाह सकेगी।
श्रेष्ठ व्यक्तियों से श्रेष्ठ समाज बनता है। आज समाज में प्रतिभाशाली व्यक्तियों की कमी हो रही है। उसके लिए मातृशक्ति की मनोगत अवस्था उत्तरदायी है।
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