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एक शिक्षाप्रद कहानी - हमें दूसरों को सुधारने की बजाए खुद सुधरने पर जोर देना चाहिए !


चाणक्य एक जंगल की झोपड़ी में रहते थे। यहां अनेक लोग उनसे परामर्श और ज्ञान प्राप्त करने आते थे। जिस जंगल में वह रहते थे, वह पत्थरों और कंटीली झाड़ियों वाला था। उस समय लोग नंगे पैर ही यात्रा करते थे।
इसलिए उनके निवास तक पहुंचने में लोगों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता था। वहां पहुंचते-पहुंचते लोगों के पैर लहूलुहान हो जाया करते थे।
एक दिन कुछ लोग उस मार्ग से बेहद परेशानियों का सामना कर चाणक्य के पास पहुंचे। एक व्यक्ति ने उनसे निवेदन किया कि आपके पास पहुंचने में हमें बहुत कष्ट होता है। आप महाराज से जमीन के चमड़े से ढंकवाने की व्यवस्था करें।
इससे लोगों को आराम होगा। उसकी बात सुनकर चाणक्य मुस्कुराए और बोले, महाशय चमड़ा बिछाने से यह समस्या हल नहीं होगी।
कंटीले व पथरीले पथ तो इस विश्व में अनगिनत हैं। ऐसे में पूरे विश्व में चमड़ा बिछवाना असंभव है। यदि आप चमड़े से अपने पैरों को सुरक्षित कर लें तो अवश्य ही पथरीले पथ व कटीली झाड़ियों के प्रकोप से बच सकते हैं।
संक्षेप में
दरअसल हमें दूसरों को सुधारने की बजाए खुद सुधरने पर जोर देना चाहिए। इसके कार्य में जरूर सफलता मिलती है। दुनिया को नसीहत देने वाला कुछ नहीं कर पाता जबकि उसका पालन करने वाला कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंच जाता है। 
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