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बेटी का हाथ किसके साथ ???



गाँव,देहात में अक्सर अधिक बेटी वाला परिवार मध्यम य गरीब वर्ग से सम्बंध रखता है !! उसके कई कारण हो सकते है पर मुख्यतः ये कारण तो हर समस्या के पीछे संलिप्त रहती ही है जो है अज्ञानता ! अज्ञानता यानि जीवन जीने के लिए उस ज्ञान का न होना जिससे जीवन को सुसज्जित करके आरामपूर्वक जिया जा सके !! आज बेटी अगर एक से अधिक हो जाये तो जन्म होते ही उसे बोझ और अन्य गलत नाम से उसका इस धरती पर स्वागत कर दिया जाता है !! बेटा-बेटी में अभी भी दूध,दाल में भेदभाव ये अभी भी आम है !! पता नही क्यों ?? ये डीएनए की समस्या है य समाज के कुत्सित सोच का प्रभाव ! जब नर-नारी दोनों को प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित करके जीने की कला का प्रमाण और मिसाल इतिहास में पहले से दर्ज हो फिर क्यों और किस बात पर बेटी से भेदभाव ये समझ से परे है !! आज बेटी बढ़ी हो तो माता-पिता उसके वस्त्रो और दुप्पटा ओढ़ कर जाये ताकि समाज सम्मान भाव से देखे इसका विशेष ख्याल रखा जाता है पर उन बेटे को कभी कोई सीख नही दी जाती कि पराई स्त्री पर कु-दृष्टि न डाले ! उसके लिए बुरे ख्याल और विचार मन में न आये !! आज भारत में जो नियम और सोच है वो स्त्री वर्ग के लिए ठोस अधिक है पर पाश्चात्य जगत का प्रभाव ऐसा भारत पर पड़ा कि बेशर्मी और नग्नता की हदे आज यही स्त्री वर्ग तोड़ रही है !! ये मर्यादा लांघने के पीछे स्त्री वर्ग के साथ कई वर्षो का भेदभाव भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है जो पुरुषो की तुलना में उनके लिए अधिक थे ! फिर थोड़ी बढ़ी अगर बेटी हो तो शादी-ब्याह की चिंता हर माँ-बाप को होती है और बेटी को निपटाने के भाव से कुछ माता-पिता अपने बेटी को ऐसे नशेड़ी,मक्कार,कामुक,बेरोजगार,बूढों को सौंप देते है जिसे देखकर कोई यही कहेगा कि ये फैसला कोई सामान्य मानव का नही बल्कि किसी पशु जाति प्रतीक के व्यक्ति का है !! और कुछ ऐसे सम्पन्न वर्ग से होते है जो अपनी मर्जी से भागकर शादी करते है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका फैसला और उनके अनुसार चुना गया व्यक्ति उसका जीवन साथी बनने के लिए योग्य है ! कहीं न कहीं ऐसे आधुनिक बेटी अपने माँ-बाप के संस्कार और उनके फैसले को ही अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती दे देते है !! बाद में जो होता है वो ऐसा होता है जिसको लिखने के लिए कलम भी शर्मा जाये क्योंकि मात्र बेटी को निपटाने य बेटी खुद के फैसले के आधार पर जो ब्याह करती है उसका परिणाम आगामी जीवन में बहुत ही दुखदायी ही होता है और बहुत कम ऐसे उदाहरण मिलेंगे जहाँ वर-वधु ने अपना जीवन ख़ुशी से सुखी-पूर्वक बिताया हो !!! आज भारत में धैर्य और विवेक भाव का विलोपन होता  जा रहा है और बाहरी ख़ुशी के आवरण को सच मानकर सब खुश हो रहे है पर बढ़ते सोशल मीडिया में ज्योतिष ग्रुप में सर्वे के अनुसार आज शादी-व्याह,डाइवोर्स के केसेस में सबसे ज्यादा डीवोर्से से सम्बन्धित समस्या अधिक है जहाँ अधिकतर नव-विवाहितों को साथ भर के कुछ लम्हों के क्षण सुख से मन भरकर अलग होना ज्यादा उचित लग रहा है !! अंत में यही सवाल माता-पिता को करना चाहिए कि उनकी बेटी का हाथ किसके साथ ??



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