ज्ञानसागर ब्लॉग में आपका हार्दिक अभिनंदन है !! किसी भी सुझाव,विचार,विमर्श के लिए संपर्क करे 8802939520

Header Ads



Shree Mahavir Tirthkar Chalisa | श्री महावीर "तीर्थकर" चालीसा | चालीसा संग्रह | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

Shree Mahavir Tirthkar Chalisa | श्री महावीर "तीर्थकर" चालीसा | चालीसा संग्रह | Gyansagar ( ज्ञानसागर )


॥ दोहा ॥

शीश नवा अरिहन्त को , सिद्धन करूं प्रणाम । 
उपाध्याय आचार्य का , ले सुखकारी नाम । 
सर्व साधु और सरस्वती , जिन मन्दिर सुखकार ।। 
महावीर भगवान को , मन - मन्दिर में धार ॥

 ॥ चौपाई ॥ 

जय महावीर दयालु स्वामी , वीर प्रभु तुम जग में नामी । 
वर्धमान है नाम तुम्हारा , लगे हृदय को प्यारा प्यारा । 
शांति छवि और मोहनी मूरत , शान हँसीली सोहनी सूरत । 
तुमने वेश दिगम्बर धारा , कर्म - शत्रु भी तुम से हारा । 
क्रोध मान अरु लोभ भगाया , महा - मोह तम से डर खाया ।


 तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता , तुझको दुनिया से क्या नाता । 
तुझमें नहीं राग और द्वेश , वीर रण राग तू हितोपदेश । 
तेरा नाम जगत में सच्चा , जिसको जाने बच्चा बच्चा । 
भूत प्रेत तुम से भय खावें , व्यन्तर राक्षस सब भाग जावें ।
 महा व्याध मारी न सतावे , महा विकराल काल डर खावे । 
काला नाग होय फन - धारी , या हो शेर भयंकर भारी ।
 ना हो कोई बचाने वाला , स्वामी तुम्हीं करो प्रतिपाला ।
 अग्नि दावानल सुलग रही हो , तेज हवा से भड़क रही हो ।
 नाम तुम्हारा सब दु : ख खोवे , आग एकदम ठण्डी होवे । 
हिंसामय था भारत सारा , तब तुमने कीना निस्तारा ।
 जन्म लिया कुण्डलपुर नगरी , हुई सुखी तब प्रजा सगरी । 
सिद्धारथ जी पिता तुम्हारे , त्रिशला की आँखों के तारे ।

  छोड़ सभी झंझट संसारी , स्वामी हुए बाल - ब्रह्मचारी ।
पंचम काल महा - दुखदाई , चाँदनपुर महिमा दिखलाई । 
टीले में अतिशय दिखलाया , एक गाय का दूध गिराया । 
सोच हुआ मन में ग्वाले के , पहुँचा एक फावड़ा लेके । 
सारा टीला खोद बगाया , तब तुमने दर्शन दिलाया ।
 जोधराज को दु : ख ने घेरा , उसने नाम जपा जबा तेरा । 
ठंडा हुआ तोप का गोला , तब सब ने जयकारा बोला । 
मन्त्री ने मन्दिर बनवाया , राजा ने भी द्रव्य लगाया ।
 बड़ी धर्मशाला बनवाई , तुमको लाने को ठहराई । 
तुमने तोड़ी बीसों गाड़ी , पहिया खसका नहीं अगाड़ी ।
 ग्वाले ने जो हाथ लगाया , कि तो रथ चलता ही पाया ।
 पहिले दिन बैशाख वदी ' के , रथ जाता है तीर नदी के ।

 मीना गूजर सब ही आते , नाच - कूद सब चित उमगाते । । 
स्वामी तुमने प्रेम निभाया , ग्वाले का बहु मान बढ़ाया ।
 हाथ लगे ग्वाले का जब ही , स्वामी रथ चलता है तब ही । ।
 मेरी है टूटी सी नैया , तुम बिन कोई नहीं खिवैया । 
मुझ पर स्वामी जरा कृपा कर , मैं हूँ प्रभु तुम्हारा चाकर ।
 तुम से मैं अरु कछु नहीं चाहूँ , जन्म - जन्म तेरे दर्शन पाऊँ । 
चालीसे को ‘ चन्द्र ' बनावे , महावीर प्रभु को शीश नवावे । 

 । । सोरठा । ।  

नित चालीसहि बार , पाठ करे चालीस दिन । । 
खेय सुगन्ध अपार , वर्धमान के सामने । । 
 होय कुबेर समान , जन्म दरिद्री होय जो । 
जिसके नहिं सन्तान , नाम वंश जग में चले । । 



सारांश सागर

सारांश सागर द्वारा प्रकाशित किया गया

अनुभव को सारांश में बताकर स्वयं प्रेरित होकर सबको प्रेरित करना चाहता हूँ !             


No comments

Powered by Blogger.