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एक सच्ची घटना - स्वाभिमान सर्वोपरी !! | Social Concern | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

एक सच्ची घटना - स्वाभिमान सर्वोपरी !! | Social Concern | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

घटना 23 जून रात की है, किसी कारण आधी रात में ही गुड़गांव से निकलना पड़ा, करीब 2:00 बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचा, गाड़ी का पता किया 2 घंटे बाद प्लेटफार्म नंबर 14 पर आनी थी तो वहीं जाकर बैठ गया | अचानक अपने पीछे गिलासी खड़कने की आवाज आई, मुड़कर देखा तो करीब 3 साल की बच्ची फटे से मैले-कुचैले कपड़ों में प्लेटफॉर्म के फर्श पर सोई हुई थी, उसका पैर लगने से गिलासी उलट कर दूर जा गिरी, वह झटके से उठी और सहमी सी चुपचाप गिलासी को उठाकर ले आई और फिर से सोने के लिए लेट गई ।

ये घटना तो सामान्य थी पर उस बच्ची के चेहरे के भाव ने मन उद्वेलित कर दिया , उसका भावहीन चेहरा और व्याकुल सी आंखें चारों ओर सुनसान पड़े प्लेटफॉर्म को निहार रही थी , मेरे बैग में कुछ चिप्स और बिस्किट के पैकेट पड़े थे मैंने चिप्स का पैकेट निकालकर उस बच्ची की ओर बढ़ाया तो सहसा अपनी मां की ओर देखने लगी, उसकी मां ने आंखों से मौन स्वीकृति दी तो बच्ची पैकेट लेकर बड़ी तेजी से खाने लगी , अब मन और ज्यादा परेशान था कि आखिर बात क्या है , पॉलिथीन की खड़खड़ाहट से पास में सोई बड़ी बहन जिसकी उम्र करीब 8 साल होगी वो भी उठकर बैठ गई , निगाहें उसकी भी पैकेट पर थी , उदास चेहरा और ठिठकती आंखें जैसे छोटी बहन को खाता देख अपना पेट भरने का भावनात्मक प्रयास कर रही हों ।  मैंने बैग से बिस्किट निकालकर बड़ी बहन की ओर बढ़ाया तो उसने भी मां से मौन स्वीकृति ले धीमी सी मुस्कान के साथ मेरे हाथ से पैकेट पकड़ा और खाने लगी |

अब शायद उनसे बात करने का अवसर था तो मैं बैंच पर बैग रखकर उन्ही के पास नीचे जा बैठा | बातचीत करने पर पता चला ये परिवार बिहार का रहने वाला है और अंबाला में भट्टे पर काम करके थोड़े पैसे कमाकर कुछ दिन वापस अपने घर रहने जा रहा था , दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद थोड़ी देर के लिए आंख क्या लगी कोई उनके पति की जेब से मोबाइल और अब तक बचाए 4000 रूपये ले उड़ा...

अब हालत यह थी कि वो आदमी अपना पूरा परिवार रेलवे स्टेशन पर छोड़कर अपने घर पैसे लाने गया हुआ था जिससे परिवार को वहां तक ले जा सके , ये तीनों मां बेटी 2 दिन से उसी हालत में वहीं रेलवे स्टेशन पर उसका इंतजार कर रही थी , मैंने पूछा खाने की क्या व्यवस्था है तो उनकी मां ने उत्तर दिया कि भैया अंबाला से पूडी बनाकर चले थे वही खा रहे हैं | प्रश्न किया की बासी खाना क्यों खा रहे हो, तो उत्तर मिला और चारा क्या है ...?

थोड़ी देर और बात की तो पता चला की पूरियां भी खत्म होने वाली है इसलिए मां कल से इसलिए कुछ नहीं खाया कि कहीं पति को आने में एक-दो दिन और देर हुई तो बच्चे कम से कम भूखे ना रहे......

इतनी बातचीत के बाद मेरा मन और शरीर दोनों शिथिल से हो गए , अपनी वह परेशानी भी भूल गया जिस कारण दिल्ली से रात में चलना पड़ा | अब किसी भी स्थिति में मन इनकी मदद करना चाहता था तो कुछ पैसे निकाल कर उनकी मां की और बढाए और कहा कि जब तक इनके पापा ना आ जाए तब तक के लिए आप इनको रखिए , तो जवाब मिला कि "भैया हमको कितने पैसे देगा तो तुम कैसे जाएगा" मैंने समझाया कि मेरा घर पास ही है आप रखिए , तो भी उस औरत के स्वाभिमान ने उन पैसों को स्वीकार करना गंवारा नहीं किया , मेरी लाख कोशिशों के बावजूद भी उन्हें भूखा रहना स्वीकार था पर मुझसे एक भी रुपया लेना बिल्कुल अस्वीकार्य था

इस घटना के बाद कुछ प्रश्न मन में छूट गए ,‌ उनके पैसे चुराने वाला भी इसी समाज में रहता है , और इतनी मुसीबतों को झेलने के बाद अपना स्वाभिमान सर्वोपरि रखने वाला ये परिवार भी.....

अच्छाई और बुराई धरती पर हमेशा रहेंगी, शायद तय हमें करना है कि हमारे प्रयास किस तरह के समाज को जन्म देंगे..


सारांश सागर

अश्वनी त्यागी दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

सर अपनी साधना का, शेष रहना चाहिए , मैं रहूं या ना रहूं, ये देश रहना चाहिए             


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