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एक सच्ची घटना - छुट्टा नहीं है ! | Social Concern | Gyansagar ( ज्ञानसागर )


एक सच्ची घटना - छुट्टा नहीं है ! | Social Concern | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

अधिकांशतः अपने प्रत्येक मधुर व कटु अनुभव को इस प्रकार के शब्द व भाव देने का प्रयास करता हूं कि घटना आप तक यथावत पहुंचे... अभी दिल्ली से घर के लिए निकला हूं, टिकट लेने के लिए लाइन में लगा हुआ था, आजकल बुकिंग क्लर्क के नाम की नेमप्लेट सामने रखी होती है, दिनेश नाम का आदमी पीछे से आया और बुकिंग क्लर्क का नाम पढ़कर बोला राकेश भाई मेरे ₹5 नहीं देगा तो मैं तेरी कंप्लेन कर दूंगा...
असल में उसका टिकट ₹45 का था बुकिंग क्लर्क ₹50 लेकर बोला छुट्टा नहीं है, बस इसी बात पर उनकी कुछ कहासुनी हुई होगी..
अब जब वो वापस अपने पैसे मांगने आया तो बुकिंग कलर के मुंह से गालियों का जो दस्त बहना शुरू हुआ..... सच में अनपेक्षित था !
"तेरी मां की, तेरी बहन की, सालै भिखमंगे तू मेरी कंप्लेन करेगा, अभी तेरा पिछ* लाल कराता हूं , तेरे हलक में डंडा डाल कर ये करवा दूंगा, वो करवा दूंगा........ और तो और आज कुछ नयी गालियां भी सुनने को मिली .... तेरी बेटी को ये करूं वो करूं , मतलब.................

कनो से भी खून‌ बह पड़े , वो 2 मिनट सच में वैसी ही थी , सच में खून तो खौल रहा था पर चुप था क्योंकि पैसे उसको दे चुका था और टिकट मुझे ही मिलना था , बोलता तो शायद मुझे भी टिकट के बजाय वही प्रसाद मिलता, उसने पांच का सिक्का निकालकर उस आदमी को मारा और मेरा टिकट निकालना शुरू किया, मैंने दिनेश नाम के उस आदमी को हाथ से रुकने का इशारा किया, टिकट लेने के बाद मैं उसे लेकर सीधा कंप्लेन रूम गया, अब यहां एक नया ही नजारा था , लगा जैसे तारक मेहता का सीरियल चल रहा हो ...
वो तीन अधिकारी बैठे थे, मैंने पूरी घटना बताई तो मुझे ऐसा लगा कि वो तीनों मेरे ही मजे ले रहे थे,.... हां जी बहुत गलत हुआ, नहीं होना चाहिए था , क्यों मिश्रा जी ? हां जी हां बिल्कुल बहुत गलत हुआ है , अब बताओ हम क्या करें , बेटा उनको हम धमकाएंगे , मैं परिस्थिति भाप गया और फिर थोड़ा सा ड्रामा मैंने भी कर दिया !

मैं कॉन्फिडेंस भरी आवाज में दोनों हाथ बांधकर बड़े प्यार से बोला " sir I think you want that I should tweet it all to "Mr Piyush Goyal"  bcz I have a video bite of that accident , and my elder brother is also PRO in railway ministry " इतने के बाद हिंदी में आ गया क्योंकि अंग्रेजी इससे ज्यादा नहीं आती....
अब तक उन तीनों की हंसी गायब हो चुकी थी और बीच वाले महोदय कुर्सी छोड़कर खड़े हो चुके थे, मैं फिर से दुगुने कॉन्फिडेंस के साथ बड़ी प्यारी सी मुस्कान देकर बोला सर आप कुछ करेंगे या मैं घर जाने के बजाय रेलवे मिनिस्ट्री जाऊं ???

शायद इतना कहना पर्याप्त था , तुरंत बुकिंग क्लर्क इंचार्ज को बुलावा गया और एक अमला तुरंत हरकत में आकर टिकट बुकिंग ऑफिस की ओर बढ़ा, मैं भी दिनेश नाम के व्यक्ति का हाथ पकड़े पीछे पीछे चल रहा था , इसके बाद तो जैसे माहौल पूरा पर्यावरण प्रेमी सा हो गया , जैसे जनता का अपमान अधिकारियों को अपना अपमान लगा , बुकिंग क्लर्क महोदय राकेश जी को एक नहीं चार पांच अधिकारियों ने अच्छी खासी फटकार लगाई , उन्होंने भी दिनेश जी से माफी मांगी, मैं भी निकल कर अपनी ट्रेन की और बढ़ गया... 
चलते चलते याद आया मेरा तो कोई भाई रेलवे मिनिस्ट्री में पीआरओ छोड़िए चपरासी भी नहीं है 😄,  पर सरकारी अधिकारियों का ऐसा चरित्र और काम करने का इतना सुंदर तरीका शायद आज भारत के भ्रष्ट तंत्र की मूक गवाही दे गया...
अगर आपने पूरा पढ़ा है तो धन्यवाद, आपके सामने किसी अनपढ़ किसान की इज्जत अगर ऐसे उछल रही हो तो निश्चिंत होकर किसी ना किसी मंत्रालय के पीआरओ बन जाइएगा ........., 
क्योंकि ये सरकारी अधिकारी हैं भाई , और वो भी "भारत सरकार" के , दिनेश भाई का फोटो संलग्नित है !



सारांश सागर

अश्वनी त्यागी दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

सर अपनी साधना का, शेष रहना चाहिए , मैं रहूं या ना रहूं, ये देश रहना चाहिए             


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