एक सामाजिक चिंतन – नदियों से सागर का अस्तित्व है और सागर से नदियों का | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

एक सामाजिक चिंतन - नदियों से सागर का अस्तित्व है और सागर से नदियों का | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

भागमभाग भरे जीवन मे , खुद और सबके जीवन पर जब नजर गयी तो पाया कि मनुष्य का जीवन कई हद तक नदियों जैसा है और सागर वो लक्ष्य है जो परम् सत्य और अंनत है। नदियों में भी हम अपने जीवन को नदी के बूंद से तुलना कर सकते है क्योंकि विशाल जल स्रोत नदी शायद ही कोई मनुष्य बन पाया हो। ये बूंदे अपने अपने लक्ष्य तक जाती है ! कोई मनुष्य की प्यास बनती है तो कुछ पक्षियों की प्यास ! कुछ जलाभिषेक के काम आती है तो कुछ दाह संस्कार के काम ! सबका अपना अपना एक कर्म होता है और ये कर्म करने के बाद पुनः वो जल तत्व, बूंद अपने सर्वोपरि सागर से मिल जाता है। ये प्रसिद्ध वाक्य सुना ही होगा कि अंत मे गंगा को सागर से ही मिलना है।वैसे ही नदी के उद्गम स्थान से अंत तक बीच मे जो भी बूंदे सागर से नही मिल पाई हो वो भी काफी प्रयास और समय के बाद सागर से जाकर मिलती ही है। मनुष्य के कर्म भी कुछ इस ही प्रकार है ,लाख पाप,पुण्य कर ले,भटक ले अपनी इच्छाओं की आपूर्ति के लिये, अंत मे आपको सर्व सत्य और अंनत शक्ति के पास जाना ही होगा, उससे मिलना ही होगा क्योंकि उनसे ही हम और हम से ही उनकी महिमा !! सागर का कोई अस्तित्व नही अगर नदियों का जल न हो। 

भक्त से ही भगवान है की पंक्तियां बखूबी सुनी ही होगी आपने !! भक्त के बिना भगवान भगवान नही !!

आज मेरी, आपकी,उसकी य जिसकी भी इच्छाएं संपूर्ण न हो पाए हो लेकिन ये निश्चित है कि आपकी इच्छाएं ही आपके विचार प्रभावित, परिवर्तित करती है और उसी के अनुसार आपका जीवन बदलता और बनता है और उसी वस्तु विशेष य अन्य चीजो के प्रति मोह,प्रेम व विरक्ति होने के परिणाम के अनुभव के बाद अंत मे आप परमात्मा में विलीन होने के अधिकारी बन जाते है। मोह,प्रेम जैसे मनुष्य के जीवन मे जन्म-मरण के लिये जिम्मेदार है , परमात्मा से मिलने में बाधक है। वैसे ही नदियों के जल के बाधक है वे चीजे जिनके कारण उस जल बूंद को नदी से अलग होना पड़ा !! और ये सब कर्मो का खेल है।
हम आप अपने विचारों के वर्तमान समय मे प्रत्यक्ष परिणाम है !!
इसीलिए विचारों को जैसा बनाएंगे जीवन मे वैसे ही लोग मिलेंगे वैसे ही जीवन यापन होगा और वैसे ही जीवन में गति होगी !!!


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