एक सामाजिक चिंतन – आलती पालती भोजन अब क्यों नही कर रहे लोग ? | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

एक सामाजिक चिंतन - आलती पालती भोजन अब क्यों नही कर रहे लोग ? | Gyansagar ( ज्ञानसागर )


काश शादी समारोह में ऐसे ही आल्थी पालथी मारकर भोजन की व्यवस्था हो नही तो आज सबको जानवर की तरह झूठी प्लेट में ही खाना है और लाइन में लगकर खड़े होकर ही खाना होता है , बफर कफर सिस्टम के बजाय ये सिस्टम कैसा लगा आपको ??

सोशल मीडिया पर ये तस्वीर वायरल हो रही थी तो सोचा क्यों न इसपर कुछ लिखा जाये ! मै आपको अपने अनुभव साझा करना चाहूँगा जो बिलकुल सच है ! जब दसवीं में था तो दोस्तों के साथ शादी में ऐसे खाने पर टूट पड़ता था मानो कोई शेर अपना शिकार कर रहा है ! भूख से ज्यादा खाने की चाह और हर एक व्यंजन को चखने का शौक और उसका मजा अलग ही होता था खैर उस समय भी मै बफर सिस्टम यानि खुद से लेता था य वेटर देते थे पर खाता बैठकर ही था और आज जब बड़ा हुआ तो वो शौक और खाने की रूचि अब नही रही जो पहले हुआ करती थी ! अब थोड़ी समझदारी आ चुकी है तो ऐसा लगता है मानो ये सब करना उचित नही और भोजन आराम से बिना भीड़ में जंग किये भी ले ले तो उचित है पर जो समय के साथ नही बदला वो ये कि जितने अतिथि होते थे उससे कम हमेशा कुर्सी हुआ करती थी ! बैठने की कोई व्यवस्था नही जमीन पर य न ही कोई खाट की व्यवस्था ! बस एक ही इस्तेमाल होने वाले गद्दों पर चादर बिछा दी जाती और कई बार तो ऐसे शादियों के गेस्ट हाउस में वाशरूम में पानी नही आता या शौचालय की ही कोई व्यवस्था नही मतलब इन्कोमिंग फ्री और आउटगोइंग पर पाबंदी !! ये अलग ही हिसाब था ! व्यवस्था ऐसे लगती थी मानो कि खाने को भी बहुत कुछ है और ज्यादा खा लिया तो सीधे घर जाने की व्यवस्था करनी पड़ेगी य फिर आस पास शौचालय को ढूँढना पड़ेगा ! भोजन से पूर्व जो प्लेट भी होती है वो भी सही तरह से धूली हुयी नही होती है य उसमे साबुन सर्फ लगा हुआ करता है ! ये ट्रेंड शादियों में न जाने कहाँ से आया जिसमे न कोई रीती है न ही संस्कार और न ही तमीज बस जानवरों जैसी व्यवस्था में सब सज धजकर आते है और सबका झूठा खाते है और ऐसे खाने को तो त्यागना ही उचित है पर हर कोई भोजन करने के नियम से परिचित क्योंकि होता नही है इसीलिए क्या करेगा कोई ! अब ये तस्वीर जो आप उप्पर देख रहे है वो न जाने किस आश्रम य मंदिर य कार्यक्रम की है पर गाँव में मैंने अक्सर इसी तरह की व्यस्था को करते देखा है और पाया है और उस समय माहौल काफी सामाजिक हुआ करता था पर आज किसीके पास समय नही है !! इसिलोये परोसने वाला सिस्टम ही हटा दिया ताकि पैसे की बचत हो जाये जबकि कई बार ऐसा होआ है कि भोजन करने वाला व्यक्ति गलती से उसका झूठा भोजन पात्र में भूलवश य तो गिर जाता है य भीड़ में , प्रतिस्पर्धा में पहले लेने की चाह में लोग धक्का मुक्की भी करते हुए पाए जाते है ! उम्मीद है हमारी सत्य सनातन परम्परा फिर से आज लोग अपनाएंगे इस लेख को पढ़कर और इस तस्वीर को देखकर ! अपने बहुमूल्य सुझाव य अनुभव जरुर साझा करें!
आपका सारांश सागर

सिंह लग्नफल

 

 

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