एक सामाजिक चिन्तन – अपराध का मूल कारण हमारी इच्छाओं और मान्यता का होना है | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

नमस्कार पाठको ! बीते दिनों काफी दिनों से परेशान और व्यथित था ! कहीं न कहीं समाज की मान्यताओं को मै भी मानने लगा था ! जिस तरह से ज्ञानसागर परिवार को मै वर्ष २०१५ से समय दे रहा था उस जैसे अब शायद नही दे रहा हूँ क्योंकि समाज की मान्यताओं ने मुझे मेरा जीवन, परिवार और मेरे करियर के बारे में मुझे अहसास करा दिया था पर मै भूल गया था जो ईश्वर भक्त होते है उन्हें सिर्फ कर्म करने का अधिकार है उसके फल का अधिकार शायद उसको नही है मतलब फल तो मिलता ही मिलता है पर कब मिलेगा ये सोचकर अगर कर्म करेंगे तो शायद कर्म न ही मिले क्योंकि मेरे जीवन में मैंने बचपन से ही विद्या ग्रहण करने के लिए एक पिपासु जिज्ञासा वाला बालक रहा करता था और इच्छुक विषयों के प्रति आज भी मेरा यही रवैय्या है पर धन अर्जित करने का लोभ य इच्छा शुरू से नही हुयी हाँ सपने जरुर देखे पर ये नही सोचा कि इतना रुपया कमाना है और इतना नही , बस यही सोचता कि इतना कमाना है कि जो भी इच्छाएं है वो सब पूरी कर लूँ , अभी तक का सफर ऐसा है कि काफी इच्छाओं की पूर्ति हुयी है पर उस वक्त नही जब मैंने चाहा !
उस वक्त जब प्रभु ने चाहा और ये सब बताने का अभिप्राय आज कल के अखबार और दिल्ली एनसीआर में बढ़ रहे अपराध य पहले से अब तक हो रहे अपराध पर मेरी प्रतिक्रिया और मेरा दृष्टिकोण आप सबके साथ साझा करना है ! हालाँकि सोचता था कि एक बार में ऐसी व्यवस्था बना दूँ जिससे कोई गलत काम , पाप , अधर्म, अपराध न हो पर विधि का विधान है कि वो होकर ही रहेगा और जिस तरह से दुष्कर्म,हत्या,डकैती,चोरी,भ्रष्टाचार की खबर पढ़ रहा हूँ और आप सब भी शायद पढ़ते,सुनते होंगे उसका कारण आप भी जानना चाहेंगे !!
एक सामाजिक चिन्तन - अपराध का मूल कारण हमारी इच्छाओं और मान्यता का होना है | Gyansagar ( ज्ञानसागर )

प्रथम कारण तो यही है अज्ञानता य मार्गदर्शन न मिल पाना जिससे अपराधिक गतिविधि में शामिल य अपराध करने वालो कोई ये समझा सके कि आप का निर्णय सही है य गलत , दूसरा सामाजिक प्रतिष्ठा और योग्यता व् हैसियत से बढ़कर भौतिक संसाधन व् वस्तुओ की लालसा य प्राप्ति करने की चाह और तीसरा कारण अन्न,जल व् वातावरण का प्रभाव अब इसमें सबसे बड़ी चीज इसमें जो है वो है समाज के नियमो और मान्यताओं के अनुसार हम कहीं न कहीं अपने से कम सम्पन्न लोगो के प्रति दृष्टिकोण य नजरिया हेय रख लेते है और उच्च व् धनी सम्पन्न वर्ग के लोग जब जैसे गुण,व्यवहार और जीवन शैली अपनाते है , उनसे कम य उन्हें अपना आदर्श मानने वाले उन्ही ही अनुसरण करने लगते है , क्योंकि उनकी मान्यताओं के अनुसार उनसे उच्च य सम्पन्न वर्ग य परिवार जो कर रहे है वो सही है जबकि सही य गलत का निर्णय सम्पन्नता एवं विपन्नता से नही अपितु कर्म के भाव व् उसके प्रभाव से निर्धारित होता है और यही पर मध्यम,निचले वर्ग वाले लोगो का जीवन भ्रष्ट होना शुरूकि कर देता है !

आप जानते होंगे कि कबूतर व् कौउए का झुण्ड एक दिशा में भोजन करे ये जरूरी नही , प्रकृति के सब जीव एक ही जाति के हो या अन्य जाति के , उनका मन,स्वाभाव,प्रकृति सब अलग अलग होते है जो स्वाभाविक है पर हम मनुष्य और उनके अभिभावक अपने बच्चो पर तरह तरह के दबाव बनाते है खुसामद करते है , किसीके जैसा बनने की राह दिखाते है , ये एक हद तक सही हो सकत है पर हर वक्त सही हो ये जरूरी नही क्योंकि जीवन का लक्ष्य निर्धारण करने में एक शिशु य बालक खुद को अपने इच्छा व् प्रकृति के अनुसार उस कर्म का चयन करता है जिसमे वो सहज अनुभव करता है और जिसमे उसका मन य ख़ुशी होती है अब आज कल के अभिभावक अपने अपूर्ण सपने को अपने बच्चो पर थोप देते है , यदि उस बच्चे की भी अपूर्ण इच्छा वही इच्छा है तो शायद वो अपूर्ण इच्छा पूर्ण हो जाये पर जब वो अअपूर्ण इच्छा बच्चे की इच्छा न हो तो वो उसे दबाव में करता है य मानसिक तनाव के साथ य फिर शायद छोड़ दे य अपने प्राण त्याग दे और कई बार जीवन के लक्ष्य को चुनने के भ्रम और परेशानी में उसके इच्छा उसपर हावी होना शुरू कर देते है !
समाज के विभिन्न वर्ग के लोग उसकी तुलना दूसरो से करना शुरू कर देते है और उस बालक पर ऐसा दबाव बनता है जिससे उसपर जल्द से जल्द अधिक सम्पन्न बनने की चाह की भावना आने लगती है , जब मेहनत से कोई सफलता प्राप्त करने में कठिनाई य लम्बा वर्ष दिखता है तो उसे शॉर्टकट सूझना शुरू हो जाता है और ऐसे में उसके फिर ऐसे मित्र य माहौल मिलता है जिससे अपराधिक सुझाव वाले उसके विचार होने लगते है जिससे तुरंत य कम समय में वो अमीर य अधिक सम्पन्न बन जाये !
वास्तव में समाज का नजरिया ही कुछ ऐसा है कि हम कम सम्पन्न वाले के प्रति कम समय य कम तारीफ य कम बोलते य उनकी कम सुध लेते है पर अधिक सम्पन्न वाले के चरण स्पर्श और चाटुकारिता तक कर देते है , संतोष किसीको नही होता , अधिक सम्पन्न वाला अपनी हैसियत और सम्पन्नता की आड़ में कम सम्पन्न वालो को अपने जीवन के अनुभव व् अपनी सफलताएँ गिनाता है और वही दूसरी तरफ कम सम्पन्न उसको सुनकर अवसाद में आने लग जाता है य कोई मजाक बना दे तो क्या ही कहे !!!
खैर जब कम सम्पन्न य तनाव से य परेशानी से य संघर्ष कर रहे व्यक्ति य परिवार को जब ये सहा नही जाता य उसको सांत्वना य विश्वास व् हिम्मत बनाने के बजाय उसको उपेक्षा का शिकार जब होना पड़ता है तो वो तीन चीज करता है यानि ३ निर्णय जो जीवन में उसे विख्यात य कुख्यात बना देती है !!
पहला वो सबको इग्नोर कर अपने जीवन के लक्ष्य पर दृढ़ता से आगे बढ़ता है
दूसरा वो ये सब सह नही पाता और समाज की मान्यताओं और तनाव से ग्रसित हो खुद को य अपने परिवार को मुक्त कर देता है
और तीसरा वो अपने ही सम्पन्न धनी लोगो को कुचलने य परिचित य जान पहचान वालो के घर सेंध लगाता है यानि अहित करके खुद को सम्पन्न करने की योजना बनाता है !!
और चौथा अपने लक्ष्यों को छोड़ , समाज की मान्यताओं को मानकर, डरकर वो भी वही राह चुन लेता है जिसपर सब चल रहे है यानि भेड़ चाल य मजबूरी की चाल जो गलत नही है परिस्थिति कई बार इस पर चलने को आप को मजबूर भी कर सकती है !!
इनमे २ ,३ समाजिक दृष्टि से अशोभनीय है इसीलिए शायद कहा भी गया है कि आप अपने सम्पन्नता य विपन्नता का बखान न करे क्योंकि हो सकता है सम्पन्नता को सुनकर कोई विपन्न आपसे सहायता की उम्मीद करे जो गलत भी नही है पर अगर आप नही करते है तो उसमे रिश्तो में दरार य अप्रिय घटना घटने की सम्भावना हो जाती है और अगर विपन्नता का बखान आपने कर दिया तो हो सकता है कि कोई सम्पन्न आपसे सम्बन्ध न बनाये य आपसे सम्बन्ध तोड़ दे य आपके रिश्ते प्रभावित हो जाये क्योंकि दुखी व्यक्ति ,सम्बन्धी य परिवार किसको पसंद हो सकते है ! कभी कभी तो चल सकता है पर बार बार उसी का रोना शायद आपके मान सम्मान को प्रभावित कर दे !! हालाँकि मान सम्मान एक मान्यता ही होती है जो समय समय पर बदलते रहती है फिर भी हमे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जीवन में लक्ष्य ऐसा हो जिससे खुद के जीवन को परेशान य संकट में डाल दे और दूसरा अगर जिगर य हिम्मत हो तभी कठिन रस्ते पर चले क्योंकि तप से भरे रस्ते हर कोई सह नही सकते और इसी तप को न सह पाने और अपनी योग्यता व् हैसियत से बढ़कर भौतिक जगत के वस्तुओ की चाह की पूर्ति में अपराध हो ही जाते है इसीलिए इस लेख से आप ये समझ सकते है सुख हो य दुःख , मान्यता ही वास्तव में ख़ुशी का कारण है और मान्यता ऐसी रखे जिसे आप पूरी कर सके !!
नोट – सम्पन्नता य विपन्नता मात्र एक परिस्थिति का अंग है , ये सत्य है कि आज अगर कोई विपन्न है तो अपने कठिन परिश्रम व् तप से कल सम्पन्न हो सकता है और वही अगर आज कोई सम्पन्न है तो अपने गलत कर्म य व्यवहार से विपन्न बन सकता है !!
उम्मीद है आपको ये लेख पसंद आया हो !
लेख पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!
सिंह लग्नफल

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